भारतीय परम्परा में धर्म की अवधारणा एवं मानवतावाद
डॉ0 अर्चना शर्मा
एस¨शिएट प्र¨फेसर, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी-221005
भारतीय परम्परा में ‘धर्म’ शब्द अत्यन्त व्यापक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। सामान्यतः यह सामाजिक व्यवस्था के नियामक तत्त्व के अर्थ में अधिक प्रचलित है। चूंकि समाज-निर्माण के मूल में मानव एवं उसके अन्तःसम्बन्ध ह¨ते हैं। मानव के रक्षणार्थ एवं कल्याणार्थ सामाजिक विधियां बनती हैं। इन विधिय¨ं क¨ प्राचीन भारतीय परम्परा में धर्म की संज्ञा दी गयी है। मानवतावाद के मूल में भी ‘मानव’ का कल्याण निहित ह¨ता है। अतः धर्म एवं मानवतावाद के सम्बन्ध में मीमांसा अत्यन्त प्रासंगिक है। भारतीय संस्कृति, एकता, अखण्डता एवं सहिष्णुता का संदेश देती है। आत्मसातीकरण हमारी संस्कृति का विलक्षण गुण है। ‘‘एकं सदविप्रा बहुधा वदन्ति’’ हमारा आदर्श रहा है। ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः तथा वसुध्©व कुटुम्बकम्’’ हमारे आचारिक सिद्धांत हैं। इन
सबके मूल में है- हमारी धर्म भावना। दुर्भाग्य से कालान्तर में हमने धर्म की मिथ्या एवं संकीर्ण व्याख्या प्रारंभ कर दिया; जिससे हमारी सामाजिक समरसता संकट में पड़ गयी। प्रस्तुत पत्र्ा का उद्देश्य भारतीय परम्परा में धर्म की अवधारणा की व्याख्या करना तथा साथ ही मानवतावाद विश्¨षतः एकात्म मानववाद के चिन्तन में प्रयुक्त धर्म के विमर्श का विश्ल्¨षण करना है।
‘धर्म’ संस्कृत शब्द है, जिसका प्रय¨ग कई अथर्¨ं में ह¨ता आया है। यह शब्द ‘धृ’ धातु से बना है जिसका अर्थ है- धारण करना, आलम्बन देना, पालन करना। यह शब्द अनेक परिवर्तन¨ं एवं विपर्यय¨ं के चक्र में घूम चुका है। ऋग्वेद की ऋचाअ¨ं में यह शब्द लगभग 56 बार प्रयुक्त है जहाँ इसे या त¨ विश्¨षण के रूप में या संज्ञा के रूप में प्रय¨ग किया। ऋग्वेद की कुछ ऋचाअ¨ं में यह शब्द पुल्लिंग में प्रयुक्त हुआ है। अन्य स्थल¨ं पर नपुंसक लिंग में। अधिक स्थानांे पर यह धार्मिक विधिय¨ं या ‘धार्मिक क्रिया संस्कार¨ं’ के रूप में प्रयुक्त हुआ है। कहीं-कहीं इसे निश्चित नियम या आचरण नियम के अर्थ में भी प्रय¨ग किया गया है।1 धर्म शब्द के उपर्युक्त अर्थ वाजसनेयी संहिता में भी मिलते हैं। वेद की भाषा में उन दिन¨ं इस शब्द का वास्तविक अर्थ क्या था; यह कहना कठिन है।2 अथर्ववेद में ‘धर्म’ शब्द का प्रय¨ग ‘‘धार्मिक क्रिया- संस्कार करने से अर्जित गुण’’ के अर्थ में हुआ है।3 ऐतरेय ब्राह्मण में धर्म शब्द सकल धार्मिक कर्तव्य¨ं के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।4 छान्द¨ग्य उपनिषद्5 में धर्म की तीन शाखाएं मानी गयी हैं-
1. यज्ञ, अध्ययन एवं दान, अर्थात् गृहस्थ धर्म।
2. तपस्या अर्थात् तापस धर्म।
3. ब्रह्मचारित्त्व अर्थात् आचार्य के गृह में अन्त तक रहना।
यहाँ धर्म शब्द आश्रम के विलक्षण कत्र्तव्य¨ं की अ¨र संकेत कर रहा है। धर्म का अर्थ परिवर्तनशील रहा। किन्तु अन्त में यह मानव के विश्¨षाधिकार¨ं, कत्र्तव्य¨ं, बन्धन¨ं का द्य¨तक, आर्य जाति के सदस्य की आचारविधि का परिचायक एवं वर्णाश्रमधर्म का द्य¨तक ह¨ गया। तैत्तिरीय¨पनिषद् में छात्र्ा¨ं के लिए ज¨ धर्म शब्द प्रयुक्त हुआ है, वह इसी अर्थ में है- यथा ‘‘सत्यं वद’’, ‘‘धर्मं चर’’ आदि। भगवद्गीता के ‘‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः’’ में भी धर्म शब्द का यही अर्थ है।6 प्राचीन धर्मशास्त्र्ा¨ं में भी धर्म शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त है। मनुस्मृति के अनुसार मुनिय¨ं ने मनु से सभी वणर्¨ं के धमर्¨ं की शिक्षा देने के लिए प्रार्थना की थी। मनु ने धर्म के दश लक्षण¨ं का उद्वाचन किया।7 यही अर्थ याज्ञवल्क्यस्मृति में भी पाया जाता है। मनुस्मृति के व्याख्याता मेधातिथि के अनुसार स्मृतिकार¨ं ने धर्म के पांच स्वरूप माने हैं- (1) वर्णधर्म, (2) आश्रमधर्म, (3) वर्णाश्रमधर्म, (4) नैमित्तिक धर्म (यथा प्रायश्चित), (5) गुण धर्म (अभिषिक्त राजा के संरक्षण-सम्बन्धी कत्र्तव्य)।
इस संदर्भ में प्राचीन भारतीय साहित्य में संदर्भित धर्म की गूढ़ व्याख्याअ¨ं की अ¨र संकेत करना अपेक्षित है। समाजशास्त्र्ाी पी0एच0 प्रभु ने इस हेतु एक परवर्ती उपनिषद का उल्ल्¨ख किया है8- ‘‘सम्पूर्ण सचर जगत की प्रतिष्ठा धर्म से है। इस संसार में प्रजा सदैव ही, मार्ग-दर्शन के लिए धर्मनिष्ठ मनुष्य की ओर निहारा करती है। धर्म से पापों का क्षय होता है। धर्म से ही हर वस्तु प्रतिष्ठित है। इसीलिए धर्म सवर्¨परि है।’’ समाज में स्थिरता क¨ स्थापित रखने वाली शक्ति के रूप ‘धर्म’ के अभिप्राय अ©र प्रय¨जन क¨ श्रीकृष्ण ने महाभारत के तीन श्ल¨क¨ं के अन्तर्गत बताया है। धर्म के विषय में अर्जुन क¨ उपदेश देते हुए वे कहते हैं, ‘‘धर्म की रचना सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण के निमित्त हुई है।’’9 अ©र यह कि ‘‘ऐसे सभी आचरण जिससे किसी प्राणी का अनिष्ट नहीं ह¨ता ह¨, धर्मरूप है, क्य¨ंकि धर्म सृष्टि क¨ अनिष्ट से बचाने के लिए रखा गया है।10 आगे कृष्ण धर्म का अ©र भी गूढ़ अर्थ बताते हुए कहते हैं- ‘‘धर्म क¨ धर्म इसलिए कहा जाता है, क्य¨ंकि वह सबक¨ धारण किये रहता है। धर्म से ही सारी सृष्टि का पालन ह¨ता है। अतः धर्म एक ऐसी शक्ति है, जिसमें सम्पूर्ण विश्व का रक्षण कर सकने की सामथ्र्य विद्यमान रहती है।’’11 महाभारत में ‘अहिंसा परम¨ धर्मः’12 तथा ‘आनृशस्यं पर¨ धर्मः’13 कहा गया है त¨ मनुस्मृति में ‘आचारः परम¨ धर्मः14 का उल्ल्¨ख है। इसके पश्चात् शास्त्र्ाकार¨ं ने धर्म के उपादान¨ं की चर्चा की है। ग©तम धर्मसूत्र्ाकार के अनुसार वेद धर्म का मूल है- वेद¨ धर्ममूलम् (1.2.2), वशिष्ठ कहते हैं- श्रुतिस्मृतिविहित¨ धर्मः (1.4.6) अ©र फिर मनु एवं याज्ञवल्क्य धर्म के पाँच उपादान¨ं की व्याख्या करते हैं। पूर्वमीमांसासूत्र्ा15 में जैमिनी ने धर्म क¨ ‘वेद विहित प्रेरक’ लक्षण¨ं के अर्थ में स्वीकार किया है। वैश्¨षिक सूत्र्ाकार ने धर्म की परिभाषा की है- ‘‘यत¨ऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः’’ अर्थात् धर्म वही है जिससे आनन्द एवं निःश्रेयस की सिद्धि ह¨।
ब©द्ध साहित्य में ‘धर्म’ शब्द कई अथर्¨ं में प्रयुक्त है। कभी इसे बुद्ध की सम्पूर्ण शिक्षा का द्य¨तक त¨ कभी इसे अस्तित्त्व का एक तत्त्व, मन एवं शक्तिय¨ं का एक तत्त्व भी माना गया है।16 बुद्ध, धम्म एवं संघ क¨ ब©द्ध धर्म का मूल कहा गया है। बुद्ध का प्रथम उपदेश ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहलाता है। बुद्ध का धर्मचक्र द¨ अतिय¨ं के मध्य का मार्ग है। पंचवग्गिय¨ं में से अश्वजित से धर्म का सार- ये धम्मा हेतुप्पभवा सुनकर सारिपुत्र्ा एवं म©द्गल्यान ने ब©द्ध धर्म क¨ स्वीकार किया था।17 अतः यह वाक्य ब©द्ध¨ं में अत्यन्त ल¨कप्रिय था। बुद्धकारक धमर्¨ं के रूप में पालि साहित्य में ‘पारमिताअ¨ं’ की चर्चा की है, महायान परम्परा में इसे ब¨धिसत्त्व चर्या कहते हैं। ये पारमिताएं आध्यात्मिक एवं नैतिक गुण¨ं यथा- दान, शील, क्षान्ति, वीर्य, प्रज्ञा आदि की पराकाष्ठा है।18 ब©द्ध दर्शन में त्र्ािकायवाद के अन्तर्गत बुद्ध के धर्मकाय, सम्भ¨गकाय तथा निर्माणकाय का उल्ल्¨ख मिलता है। धर्मकाय उनका उपदिष्ट धर्म है अथवा उनकी विशुद्ध पुण्य-गुण-राशि है, जिसमें शील, समाधि, प्रज्ञा, विमुक्ति एवं विमुक्तिज्ञानदर्शन नाम के पाँच स्कन्ध संगृहीत हैं।19 ब©द्ध¨ं के ही समान जैन परम्परा में ‘धर्म’ जैन दर्शन के सात महत्त्वपूर्ण तत्त्व¨ं- जीव-अजीव, बन्धन, म¨क्ष, आस्रव, संवर, निर्जरा में अजीव तत्त्व के अन्तर्गत आता है, जहाँ उसका अर्थ है कि वह द्रव्य ज¨ जीव की गति में सहायक है, वह धर्म है अ©र ज¨ जीव की स्थिरता में सहायक है वह अधर्म है।20
प्राचीन भारत के महान सम्राट अश¨क ने अपने ल्¨ख¨ं में ‘धम्म’ की चर्चा की है। धम्म (धर्म) क्या है? (कियं चु धंमेति) का उत्तर अश¨क के अनुसार इस प्रकार है21- पाप¨ं का अभाव (अपासिनवे), बहुकल्याण (बहु-कयाने), दया, दान, सत्य, पवित्र्ाता (दया दाने सचे स¨चये), सत्कार्यप्रभूत (साधवे) मृदुता (मादवे)। इन गुण¨ं क¨ व्यवहार में लाने के लिए अश¨क कई उपाय बताता है- अहिंसा एवं पशुवध का त्याग (अनारंभ¨ प्राणानामं, अविहिंसा भूतानां), माता-पिता की सुश्रुषा (मातरि पितरि सुस्रूसा), वृद्ध¨ं की सुश्रुषा (थ्¨र सुस्रूसा), गुरुअ¨ं का समादार (गुरुणां अपचिति), मित्र्ा¨ं, परिचित¨ं, अ©र सम्बन्धिय¨ं के प्रति तथा ब्राह्मण एवं श्रमण साधुअ¨ं के प्रति उदारता का व्यवहार (मित संस्तुत-नाटिकानां बहमणां-समणानां दानं संपटिपति), दास¨ं तथा न©कर¨ं के प्रति उदारता अ©र सम्यक् व्यवहार (दास- भतकम्हि सम्य प्रतिपति), अल्प व्यय अ©र अल्पसंचय (अप-व्ययता, अपभांडता)। उसके ल्¨ख¨ं में यह भी कहा गया है कि धार्मिक भावना अ©र आचरण के विकास के लिए मनुष्य क¨ बराबर आत्मनिरीक्षण (परिवेक्खा) करना चाहिए।22 यद्यपि उसके धर्म क¨ विद्वान अनेक रूप में व्याख्यायित करते हैं,23 परन्तु उसका उद्देश्य धर्म के माध्यम से एक नैतिक आचार संहिता का प्रसार करना प्रतीत ह¨ता है। उसके ल्¨ख में प्रयुक्त ‘पासंड’ संभवतः संप्रदाय¨ं के लिए प्रयुक्त है। अपने सप्तम् एवं द्वादश शिलाल्¨ख में वह इन सम्प्रदाय¨ं में एकता एवं समवाय की कामना करता है।24
धर्म के उपर्युक्त व्यापक संदभर्¨ं के कारण समाज चिन्तक¨ं ने पुरुषार्थ चतुष्टय में इसे प्रथम स्थान दिया। वास्तव में यही पुरुषार्थ मानव जीवन के आधार हैं। इसीलिए इन्हें आश्रम व्यवस्था का मन¨नैतिक आधार भी कहा जाता है। समाज की व्यवस्था क¨ बनाये रखने में चार पुरुषाथर्¨ं में तीन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, च©था चूंकि ‘म¨क्ष’ है जहाँ व्यक्ति के सामाजिक सर¨कार क्षीण ह¨ जाते हैं। अतः ‘त्र्ािवर्ग’ (धर्म, अर्थ, काम) क¨ ही समाज चिन्तन का आधार बताया गया है। ऐसे में अर्थ, काम रूपी पुरुषार्थ धर्माधारित है। ‘धर्म’ व्यापक अर्थयुक्त एवं देशकालानुसार संदर्भित है।25 महाभारत में ही भीष्म कहते हैं कि किसी देश अ©र काल की आवश्यकता स्थितिय¨ं एवं परिस्थितिय¨ं में जिसे धर्म माना जाता है, वहीं अन्य देश एवं कालविश्¨ष में ‘अधर्म’ बन जाता है।26 इसीलिए धर्म बहिष्करण नहीं बल्कि समावेशन का पर्याय है।
कालान्तर में इस व्यापक अर्थयुक्त ‘धर्म’ क¨ अंग्रेजी शब्द त्मसपहपवद का अनुवाद समझा गया।27 रेलिजन शब्द की उत्पत्ति ल्©टिन शब्द ‘रेलिजिय¨’ से हुई है। रेलिजिय¨ शब्द या त¨ मूल ‘ल्¨ग’ जिसका अर्थ ‘साथ-साथ या पालन है’ या मूल ‘लिंग’ जिसका अर्थ ‘सहबंध’ है, से व्युत्पन्न हुआ है। अतः ‘ल्¨ग’ के संदर्भ में इसका अर्थ दैविक संप्रेषण के चिन्ह¨ं में विश्वास तथा उसका पालन करना है तथा ‘लिंग’ के अर्थ में इसका अभिप्राय ऐसी आवश्यक क्रियाअ¨ं का संपादन है ज¨ मनुष्य एवं पारल©किक क्रियाअ¨ं क¨ एक साथ बाँध सके।28 इस प्रकार पाश्चात्य चिन्तन में इसका सम्बन्ध पारल©किकता के साथ स्थापित ह¨ता है। भारतीय परम्परा इससे पृथक् धर्म की व्याख्या प्रस्तुत करती है, जिसका उद्देश्य है मानव क¨ मानव से ज¨ड़ना।
वस्तुतः भारतीय समाज चिन्तन में धर्म नैतिकता का अधिष्ठाता है जिससे मानवता का विकास ह¨ता है। मानवतावादिय¨ं ने धर्मसंगत एवं धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद की चर्चा किया है। धर्मसंगत मानवतावाद ईश्वर प्रेरित (मिल, जेम्स, फास्टर, स्वाईत्सर) तथा अनीश्वरवादी (थ्¨रवादी ब©द्ध तथा जैनमत) द¨न¨ं ह¨ सकता है। धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद में प्रजातांत्र्ािक मानवतावाद (ड्यूबी, नेहरू) तथा जड़वादी अथवा एकाधिकारवादी मानवतावाद (साम्यवाद) की व्याख्या की जाती है। धर्म मनुष्यता का मापदंड है। सृष्टि य¨जना के साथ संदर्भित ह¨कर यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का धारक ह¨ जाता है तथा ऋत का पर्याय ह¨ जाता है। जब धर्म भ©तिक धरातल पर आता है त¨ वह भ©तिक जगत् क¨ धारण करता है। भारतीय धर्म की अवधारणा जड़ता की सीमाअ¨ं का अतिक्रमण कर गतिशीलता के एक परिवर्तनशील धरातल पर अपना आकार ग्रहण कर देश, काल तथा परिस्थिति के साथ संदर्भित ह¨कर प्रस्फुटित ह¨ती है। ज¨ समाज में बढ़ते अहंकार एवं रूढ़ि-विचारधारा का निदान कर सकती है। वह धर्म ज¨ दूसरे के धर्म क¨ हानि पहुँचाए वह सत्य नहीं ह¨ सकता। धर्म यथार्थ तभी है जब वह सभी के प्रति सहिष्णु ह¨, समावेशी ह¨।
पं0 दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी ‘एकात्म मानववाद’ की अवधारणा में धर्म के इसी व्यापक स्वरूप क¨ समाविष्ट किया। उनके अनुसार ‘‘मनुष्य के शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा के समग्र विकास य¨जना में उन्ह¨ंने पुरुषार्थ चतुष्टय अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, म¨क्ष की चर्चा किया है। म¨क्ष जीवन का चरम लक्ष्य है किन्तु इसे अर्थ एवं काम के स¨पान द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। इन सभी लक्ष्य¨ं के मूल में है ‘धर्म’। राज्य, अर्थ, दण्ड इन सभी के प्रभाव अर्थात् असंतुलित आधिक्य से धर्म से हानि पहुँचाती है। हमारे देश की आवश्यकतानुसार पुरुषार्थ चतुष्टय की महत्ता की समीक्षा करते हुए दीनदयाल जी कहते हैं कि- धर्म महत्त्वपूर्ण है, परन्तु यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अर्थ के अभाव में धर्म टिक नहीं सकता। अतः शरीर, मन, बुद्धि अ©र आत्मा सभी का विकास आवश्यक है अ©र यही एक पूर्ण मानव की एकात्म मानव की कल्पना है।’’29 वह आगे कहते हैं-‘‘ ‘धर्म’ का सम्बन्ध केवल मन्दिर, मस्जिद से नहीं है। उपासना, व्यक्ति धर्म का एक अंग ह¨ सकती, किन्तु धर्म त¨ व्यापक है। मन्दिर, मस्जिद ल¨ग¨ं में धर्माचरण की शिक्षा का प्रभावी माध्यम भी रहे हैं। किन्तु जिस प्रकार विद्यालय विद्या नहीं है वैसे ही मन्दिर धर्म से भिन्न है। ह¨ सकता है क¨ई बालक र¨ज पाठशाला जाय, फिर भी अपढ़ रह जाय। उसी प्रकार प्रतिदिन मंदिर, मस्जिद जाने वाला व्यक्ति भी धर्महीन ह¨ सकता है। मन्दिर, मस्जिद में जाना मत, मजहब, रिलीजन है। इन्हें धर्म का अनुवाद मानना हानिकारक है।यदि यूर¨प में रिलीजन के नाम पर अन्याय अ©र अत्याचार, संघर्ष अ©र युद्ध हुए त¨ वे सब हमारे यहाँ भी धर्म के खाते नामे में चढ़ा लिये गये। हमें लगा कि धर्म पर भी लड़ाई ह¨ सकती है। परन्तु धर्म की लड़ाई दूसरी है अ©र रिलीजन की लड़ाई दूसरी ह¨ती है। धर्म के तत्त्व सनातन अ©र सर्वव्यापी है हाँ उनका व्यवहार देश, काल, परिस्थिति सापेक्ष ह¨ता है। तात्त्विक आधार पर बने नियम धार्मिक ह¨ते हैं। वैधता का निर्णायक धर्म है।’’ उन्ह¨ंने आगे कहा है कि ‘‘धर्म की प्रभुता ह¨ने के कारण हमारा राज्य का आदर्श धर्मराज्य है। राजा धर्म की रक्षा के लिए है। वह अदण्ड्य नहीं है। धर्मराज्य का अर्थ थ्य¨क्रेटिक स्टेट ;ज्ीमवबतंजपब ेजंजमद्ध नहीं है। थ्य¨क्रेटिक स्टेट का तात्पर्य जहाँ किसी पंथ गुरु का राज ह¨। आजकल थ्य¨क्रेटिक स्टेट के विरूद्ध सेकुलर स्टेट शब्द प्रयुक्त किया जाता है यह भी उचित नहीं है। क्य¨ंकि इसका अर्थ ‘धर्महीन’, ‘अधार्मिक’ या ‘धर्मनिरपेक्ष’ किया गया, वह भी गलत है। धर्मनिरपेक्ष राज्य त¨ नियमहीन राज्य ह¨ जायेगा। यह सत्य है कि धर्म राज्य में भी राज्य मनमाना नहीं ह¨ता। हमारी साॅवरेनिटी धर्म में है। अतः जनराज्य क¨ धर्मराज्य भी ह¨ना आवश्यक है। सच्चा प्रजातन्त्र्ा वही ह¨ सकता है, जहाँ स्वतन्त्र्ाता अ©र धर्म की स्थापना हेतु राष्ट्रीय जीवन के अनुकूल अर्थ-रचना पर ज¨र देना आवश्यक है। मानव का उत्कर्ष किसी भी व्यवस्था का परम लक्ष्य ह¨ना चाहिए।’’30
समीक्षा स्वरूप हम कह सकते हैं कि ‘एकात्म मानव’ चूंकि एक राजनीतिक एवं आर्थिक चिन्तन है, अतः वहाँ ‘धर्म’ इन्हीं द¨ पक्ष¨ं के आस-पास अधिक दिखायी देता है। स्वाभाविक है कि राजनीतिक एवं आर्थिक चिन्तन का निर्माण समाज संरचना का एक अभिन्न अंग है, अतः प्रथम विचारणीय उसका मूल केन्द्र मानव ह¨गा ही। भारतीय परम्परा ने इस मूल क¨ काफी पहल्¨ ही समझ लिया था। फलतः मानव कल्याणार्थ मानव निर्मित व्यवस्था क¨ भारतीय परम्परा में ‘धर्म’ कहा गया है। अर्थात् ‘धर्म’ वह है ज¨ धारण करने वाला है अ©र ज¨ धारण ह¨ने वाला है। भारतीय सन्दभर्¨ं में ‘धर्म’ मानव क¨ मानव से ज¨ड़ने वाला है। इसी गूढ़ अर्थ क¨ कालान्तर में विविध सम्प्रदाय¨ं, मत¨ं व पंथ¨ं द्वारा स्थूल अर्थ में प्रय¨ग किया गया अ©र धर्म का अर्थ बदल गया। अब धर्म के द¨ अर्थ व्याप्त हुए- (1) समाज चिन्तक के लिए धर्म, (2) विविध पंथ¨ं, मत¨ं एवं सम्प्रदाय¨ं के अनुयायिय¨ं के लिए धर्म। चिन्तक के लिए धर्म की वही पुरातन एवं मूल परम्परा महत्त्वपूर्ण थी, किन्तु पांथिक¨ एवं विविध मतावलम्बिय¨ं के लिए धर्म अर्थात् नैतिकता एवं कर्तव्यब¨ध का संदर्भ विश्¨ष उपासना पद्धति एवं प्रतीक¨ं के लिए अर्थरूढ़ ह¨ गया एवं तर्क से परे की व्यवस्था ‘धर्म’ बन गयी। फलतः यह द्वितीय अर्थ सामाजिक समरसता के समक्ष संकट बनकर उभरा। इस प्रकार की व्याख्या ने असहिष्णुता, श¨षण, हिंसा, कट्टरता, बहिष्करण जैसे निकृष्ट भाव¨ं क¨ बढ़ावा दिया। मानव एवं मानवता उसके समक्ष ब©नी ह¨ गयी। समस्त प्रकार की सामाजिक -सांस्कृतिक समस्या का मूल धर्म क¨ मान लिया गया। इसके निदानार्थ धर्म के व्यापक अर्थ क¨ समझने-समझाने के बजाय इसे अस्वीकार करने का प्रचलन प्रारंभ ह¨ गया। इस प्रचलन के केन्द्र में धर्मनिरपेक्षता उपस्थित ह¨ने लगी। धीरे-धीरे ‘एकान्त मानववादी’ चिन्तन जैसी व्याख्याअ¨ं के माध्यम से यह अनुभव किया गया कि हम गलत थ्¨ फलतः अपनी गलती क¨ सुधारते हुए हमने ‘धर्मनिरपेक्ष’ के स्थान पर ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द का प्रय¨ग प्रारंभ किया। अन्ततः हम कहते हैं कि ‘धर्म’ समस्त ल¨क क¨ धारण करने वाला है, ठीक धारिणी (पृथ्वी) के समान, अतः धर्मसापेक्षता में ही समस्त मानवता का कल्याण निहित है।
संदर्भ:
1. सातवल्¨कर, श्रीपाद दाम¨दर, ऋग्वेद का सुब¨ध भाष्य, चार भाग¨ं में पारडी, 1989, 1.87.1, 10.92.2, 10.21.3 में धर्म पुलिंग में। 1.22.18, 5.26.6, 7.43.24, 9.64.1 आदि में धार्मिक विधिय¨ं एवं क्रिया के रूप में। 1.164.43 तथा 10.90.16 में ‘तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्’ ‘प्रथमा धर्माः’ (3.17.1) तथा ‘सनता धर्माणि’ (3.3.1) में प्रयुक्त। 4.53.3, 5.63.7, 6.70.1, 7.89.5 में निश्चित नियम (व्यवस्था या सिद्धान्त) या आचरण नियम है। धर्म शब्द के 56 बार प्रय¨ग का संदर्भ डॉ0 पाण्डुरंग वामन काण्¨ ने ‘धर्मशास्त्र्ा का इतिहास’, हिन्दी अनुवाद अर्जुन च©बे काश्यप, प्रथम भाग, लखनऊ, चतुर्थ संस्करण, 1992, पृ0 3, पर दिया है।
2. काण्¨, पाण्डुरंग वामन, पूर्वनिर्दिष्ट, 1992, पृ0 3
3. अथर्ववेद, संहिता, जयदेव शर्माकृत भाष्यसहित, अजमेर, सं0 2022, 9.9.17
ऋतं सत्यं तप¨ राष्ट्रं श्रम¨ धर्मश्च कर्म च।
भूतं भविष्यपुच्छिष्टे वीर्य लक्ष्मीर्बलं बल¨।।
4. ऐतरेय ब्राह्मण, आप्टे संपादित, आनन्दाश्रम, संस्कृत ग्रंथावली, कलकत्ता, 1931, 7.17 (धर्मस्य ग¨प्ताजनीति)
5. छान्द¨ग्य उपनिषद् 2.23, त्र्ाय¨ धर्मस्कन्धा यज्ञ¨ऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तव एवेति द्वितीय¨ ब्रह्मचार्या- चार्यकुलवासी तृतीय¨ऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुल्¨ऽव सादयन्। सर्व एते पुण्यल¨का भवन्ति ब्रह्मसंस्थ¨ऽमृतत्वमेति।
6. श्रीमद्भगवद्गीता, गीताप्रेस, 3.35,
श्रेयान् स्वधमर्¨विगुणः परधर्मात् स्वानुष्ठिनात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधमर्¨ भयावहः।।
7. मनुस्मृति, मणिप्रभा हिन्दी व्याख्य¨पेता, श्रीहरिग¨विन्द शास्त्र्ाी, हरिदास संस्कृत ग्रंथमाला, 226, 6.92,
धृति क्षमा दम¨स्तेयं, श©चं इन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यं अक्र¨ध¨, दसकं धर्मलक्षणम्।।
8. प्रभु, पी0एच0, हिन्दू समाज की व्यवस्था, बम्बई, पृ0 82, ल्¨खक ने महानारायण¨पनिषद् के उदाहरण से ही धर्म के संदर्भ क¨ प्रारंभ किया है,
धमर्¨ विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा।
ल¨के धर्मिष्ठम् प्रजा उपसर्पन्ति।
धर्मेण पापम् अपनुदन्ति धर्मे सर्वम् प्रतिष्ठितम्
तस्माद् धर्मम् परमं वदन्ति।। (22.1)
9. महाभारत, क्रिटिकल एडिशन, संपादक, वी0एस0 सुक्थंकर, 1949-1966, पूना, कर्णपर्व, 69.57,
प्रभवार्थ च भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम्।
10. वही, 69.58, यः स्याद् हिंसा संयुक्तः स धर्म इति निश्चयः
अहिंसार्थ च भूतनां धर्मप्रवचनं कृतम्।।
11. वही, 69.59, धारणाद् धर्म इत्याहुः धमर्¨ धारयते प्रजा।
12. महाभारत, पूवर्¨क्त संस्करण, अनुशासनपर्व, 115.1
13. वही, वनपर्व, 373.76
14. मनुस्मृति, पूवर्¨क्त संस्करण, 1.108
15. पूर्वमीमांसासूत्र्ा, 1.1.2, च¨दनालक्षण¨ऽथर्¨धर्मः
16. काण्¨, पी0वी0, पूर्वनिर्दिष्ट, पृ0 5
17. पाण्डेय, ग¨विन्दचन्द्र, ब©द्धधर्म के विकास का इतिहास, लखनऊ, प्रथम संस्करण, 1963, तृतीय संस्करण, 1990, पृ0 55
18. शर्मा, अर्चना, दान से दानपारमिता तक: ब©द्ध परम्परा में दान के विविध आयाम, वाराणसी, 2010, पृ0 1, पूर्ण विवेचन प्रथम द¨ अध्याय¨ं में।
19. पाण्डेय, ग¨विन्दचन्द्र, पूर्वनिर्दिष्ट, पृ0 343-344
20. तत्त्वार्थसूत्र्ा (उमास्वाति विरचित), विवेचक, सुखलाल संधवी, वाराणसी, सप्तम संस्करण, 2009, पृ0 5 एवं 114, शर्मा, चन्द्रधर, भारतीय दर्शन आल¨चना अ©र अनुशीलन, वाराणसी, पुनर्मुद्रित संस्करण, 2004, पृ0 40
21. भंडारकर, डी0आर0, अश¨क (हिन्दी अनुवाद), नई दिल्ली, 1974, पृ0 89-90
22. वही, पृ0 93
23. पाण्डेय, राजबली, प्राचीन भारत, संपादन एवं परिवर्धन, डॉ0 विभा उपाध्याय, वाराणसी, 2010, पृ0 111, अश¨क के धर्म के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वान¨ं के अलग-अलग मत हैं- (1) ब©द्धधर्म-सेनार्ट (इण्डियन एण्टीक्वेरी, 1891), (2) उपासक ब©द्धधर्म- डी0आर0 भण्डारकर (अश¨क), (3) ब्राह्मण धर्म-मैकफेल (अश¨क), (4) राजधर्म-फ्लीट (जर्नल ऑफ रायल एशियाटिक स¨साइटी, 1908), (5) सभी धमर्¨ं का समन्वय- स्मिथ (अश¨क), डॉ0 राधाकुमुद मुखर्जी (अश¨क)।
24. वही, पृ0 211-12
25. प्रभु, पी0एच0, पूर्वनिर्दिष्ट, पृ0 85
26. महाभारत, शान्तिपर्व, 78.32
27. उपाध्याय, आचार्य बलदेव, भारतीय धर्म अ©र दर्शन, वाराणसी, 2000, पृ0 13
28. मजुमदार, डी0एन0 एवं टी0एन0 मदन, सामाजिक मानवशास्त्र्ा परिचय, हिन्दी अनुवाद, ग¨पाल भारद्वाज, न¨एडा, छठां संस्करण, 1992, पृ0 112-113
29. उपाध्याय, दीनदयाल, एकात्म मानववाद, न¨एडा, पंचम संस्करण, 1986, पृ0 33-35
30. वही, पृ0 51-62
Received on 02.12.2016 Modified on 12.11.2016
Accepted on 30.12.2016 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 4(4): Oct.- Dec., 2016; Page 213-217